कानपुर में रानी घाट–धोबी घाट पुल के जमीन चिन्हांकन पर बवाल, ग्रामीणों ने लगाए भेदभाव के आरोप
कानपुर में प्रस्तावित पुल को लेकर ग्रामीणों का विरोध
कानपुर में रानी घाट–धोबी घाट से ट्रांस गंगा सिटी को जोड़ने वाले प्रस्तावित पुल को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और प्रशासनिक अमले के बीच विवाद की स्थिति सामने आई है। नत्थापुरवा और मांगलपुरवा गांव के ग्रामीणों ने पुल के लिए की जा रही जमीन के चिन्हांकन प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए विरोध दर्ज कराया। ग्रामीणों का कहना है कि जमीन की पहचान और उसे सरकारी या निजी श्रेणी में दर्ज करने की प्रक्रिया में समानता नहीं बरती जा रही है।
ग्रामीणों के विरोध के बाद मौके पर सेतु निगम के अधिकारी पहुंचे और लोगों से बातचीत की। स्थिति को देखते हुए फिलहाल जमीन के चिन्हांकन की प्रक्रिया रोक दी गई है। अब ग्रामीण पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
नत्थापुरवा और मांगलपुरवा के ग्रामीणों ने जताई आपत्ति
प्रस्तावित पुल को लेकर क्षेत्र में जमीन का चिन्हांकन किया जा रहा था। इसी दौरान नत्थापुरवा और मांगलपुरवा के कई ग्रामीण मौके पर पहुंचे और प्रक्रिया को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई। ग्रामीणों ने कहा कि पुल का रास्ता जिन क्षेत्रों से प्रस्तावित है, वहां जमीनों की स्थिति को लेकर स्पष्टता जरूरी है।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें इस बात की चिंता है कि चिन्हांकन के बाद उनकी जमीन पर परियोजना का असर पड़ सकता है। उनका आरोप है कि संबंधित जमीनों की पहचान करते समय स्थानीय लोगों की आपत्तियों और दस्तावेजों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है।
हालांकि ग्रामीणों के इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। पूरे मामले में प्रशासनिक जांच और संबंधित अभिलेखों की जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
जमीन को लेकर ग्रामीणों ने उठाए गंभीर सवाल
विरोध कर रहे ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जिस इलाके से प्रस्तावित पुल का रास्ता निकलना है, वहां कुछ जमीनों को सरकारी भूमि के तौर पर चिन्हित किया जा रहा है। दूसरी तरफ उनका दावा है कि बड़े बिल्डरों द्वारा खरीदी गई जमीनों को अलग तरीके से देखा जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर परियोजना के लिए जमीन का अधिग्रहण या उपयोग किया जाना है तो सभी जमीनों का रिकॉर्ड एक समान तरीके से जांचा जाना चाहिए। उनका आरोप है कि जमीन के दस्तावेजों और मौके की स्थिति के बीच अंतर होने की स्थिति में निष्पक्ष सत्यापन आवश्यक है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि चिन्हांकन से पहले राजस्व रिकॉर्ड, जमीन की मौजूदा स्थिति और संबंधित दस्तावेजों की विस्तृत जांच कराई जाए, ताकि आगे चलकर विवाद की स्थिति पैदा न हो।
लेखपाल और कानूनगो की भूमिका पर भी सवाल
विरोध के दौरान ग्रामीणों ने स्थानीय राजस्व कर्मचारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। ग्रामीणों ने लेखपाल और कानूनगो पर जमीन के चिन्हांकन में कथित अनियमितता की आशंका जताई है। उनका आरोप है कि प्रक्रिया में किसी स्तर पर मिलीभगत हो सकती है।
ग्रामीणों ने इस मामले में केवल मौजूदा चिन्हांकन की जांच ही नहीं, बल्कि संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच कराने की मांग की है। इसके साथ ही कुछ ग्रामीणों ने लेखपाल और कानूनगो की संपत्ति की जांच की मांग भी उठाई है।
इन आरोपों को फिलहाल ग्रामीणों के दावों के तौर पर ही देखा जा रहा है। संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले विभागीय या प्रशासनिक जांच जरूरी होगी।
विरोध की सूचना पर मौके पर पहुंचे सेतु निगम अधिकारी
ग्रामीणों के विरोध की जानकारी मिलने के बाद सेतु निगम के अधिकारी आशीष श्रीवास्तव मौके पर पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों से बातचीत कर उनकी आपत्तियों और शिकायतों को सुना। मौके पर मौजूद लोगों ने चिन्हांकन प्रक्रिया को लेकर अपनी बात अधिकारियों के सामने रखी।
बातचीत के बाद फिलहाल जमीन के चिन्हांकन का काम रोक दिया गया। इससे ग्रामीणों को अपनी शिकायतों और आपत्तियों को प्रशासन के सामने रखने का अवसर मिला है। अब आगे की प्रक्रिया जांच और अधिकारियों की समीक्षा के बाद तय होने की संभावना है।
निष्पक्ष जांच की मांग पर अड़े ग्रामीण
ग्रामीणों की मुख्य मांग है कि प्रस्तावित पुल के लिए जमीन चिन्हांकन की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से कराई जाए। उनका कहना है कि किसी भी परिवार या जमीन मालिक के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए और सभी संबंधित जमीनों के दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए।
ग्रामीणों ने यह भी कहा कि अगर जांच में किसी अधिकारी, कर्मचारी या अन्य व्यक्ति की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। इसके अलावा जमीन के रिकॉर्ड को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने और प्रभावित लोगों की आपत्तियों को दर्ज करने की मांग भी सामने आई है।
ट्रांस गंगा सिटी कनेक्टिविटी के लिहाज से प्रस्तावित पुल अहम
रानी घाट–धोबी घाट से ट्रांस गंगा सिटी को जोड़ने वाला प्रस्तावित पुल क्षेत्र की कनेक्टिविटी से जुड़ी महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे किसी भी बड़े निर्माण कार्य में जमीन और रास्ते के चिन्हांकन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इसका सीधा संबंध स्थानीय जमीन मालिकों और आसपास के गांवों से होता है।
परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए जमीन संबंधी रिकॉर्ड, स्वामित्व, राजस्व दस्तावेज और प्रस्तावित मार्ग की स्थिति को स्पष्ट करना जरूरी होगा। ग्रामीणों की आपत्तियों के बाद अब प्रशासन के सामने चुनौती यह होगी कि प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का समाधान किस तरह किया जाता है।
जांच के बाद साफ होगी आरोपों की वास्तविकता
फिलहाल ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि नहीं हुई है। प्रशासनिक स्तर पर दस्तावेजों और जमीन के रिकॉर्ड की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि चिन्हांकन प्रक्रिया में वास्तव में कोई गड़बड़ी या भेदभाव हुआ है या नहीं।
मौजूदा स्थिति में सेतु निगम की ओर से चिन्हांकन प्रक्रिया पर अस्थायी रोक लगाए जाने के बाद सभी की नजर आगे की कार्रवाई पर है। ग्रामीण निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं, जबकि परियोजना से जुड़े अधिकारियों के सामने जमीन संबंधी आपत्तियों को दूर कर आगे की प्रक्रिया तय करने की चुनौती है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच के बाद जमीन के चिन्हांकन को लेकर क्या निर्णय सामने आता है और प्रस्तावित रानी घाट–धोबी घाट से ट्रांस गंगा सिटी पुल की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ती है।















