भारत में चीता पुनर्वास अभियान ने नई उम्मीद जगाई है। अफ्रीकी देशों से लाए गए चीतों और भारत में जन्मे शावकों के बाद देश में इनकी संख्या 52 तक पहुंच गई है।
नई दिल्ली। कभी भारतीय जंगलों की पहचान रहे चीते की देश में दोबारा वापसी अब धीरे-धीरे एक बड़े वन्यजीव संरक्षण अभियान का रूप ले रही है। अफ्रीकी देशों से भारत लाए गए चीतों और यहां जन्मे शावकों के बाद देश में इनकी संख्या बढ़कर 52 तक पहुंच गई है। करीब चार साल पहले शुरू हुई इस पहल ने एक ऐसी प्रजाति को भारतीय वन क्षेत्रों में फिर से स्थापित करने की कोशिश को आगे बढ़ाया है, जिसे देश से विलुप्त घोषित किए जाने के बाद लंबे समय तक केवल इतिहास के पन्नों में देखा जाता था।
चीतों की संख्या में हुई बढ़ोतरी ने वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों की उम्मीदें बढ़ाई हैं। हालांकि, विशेषज्ञों के लिए यह सिर्फ संख्या बढ़ने की खबर नहीं है। असली लक्ष्य ऐसी आबादी तैयार करना है जो आने वाले वर्षों में अपने प्राकृतिक वातावरण में स्वस्थ तरीके से रह सके और खुद प्रजनन कर सके।
70 साल बाद फिर शुरू हुआ सफर
भारत में चीते के विलुप्त होने का इतिहास पुराना है। देश में आखिरी ज्ञात चीते की मौत वर्ष 1947 में हुई थी। इसके बाद 1952 में इसे भारत में विलुप्त प्रजाति घोषित कर दिया गया।
लंबे समय तक चीते को दोबारा भारत लाने की योजना पर विचार होता रहा, लेकिन इसके लिए उपयुक्त आवास, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संरक्षण की विस्तृत योजना की जरूरत थी। आखिरकार वर्ष 2022 में यह प्रयास जमीन पर दिखाई दिया, जब नामीबिया से चीते भारत लाए गए।
17 सितंबर 2022 को मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में इन चीतों को छोड़ा गया। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका से भी चीते भारत लाए गए। इस तरह भारत में चीता पुनर्वास कार्यक्रम को आगे बढ़ाया गया।
कूनो बना चीता संरक्षण का केंद्र
मध्य प्रदेश का कूनो राष्ट्रीय उद्यान इस पूरी परियोजना के केंद्र में है। यहां उपलब्ध वन क्षेत्र, घासभूमि और शिकार की मौजूदगी को चीतों के लिए अनुकूल माना गया।
भारत लाए गए चीतों को तुरंत खुले जंगल में छोड़ने के बजाय चरणबद्ध तरीके से नए वातावरण के अनुकूल किया गया। उनकी गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी गई। रेडियो कॉलर और दूसरी तकनीकों की मदद से उनकी लोकेशन, स्वास्थ्य और व्यवहार पर नजर रखी जाती रही।
यह प्रक्रिया इसलिए जरूरी है क्योंकि अफ्रीका से भारत लाए गए जानवरों के लिए यहां का मौसम, भूभाग और शिकार का स्वरूप अलग है।
भारत में पैदा हुए शावकों ने बढ़ाई उम्मीद
चीता पुनर्वास अभियान की सबसे अहम उपलब्धियों में भारत में शावकों का जन्म भी शामिल है। विदेश से चीतों को लाकर उनकी संख्या बढ़ाना एक पहलू है, लेकिन किसी भी संरक्षण परियोजना की स्थायी सफलता के लिए प्राकृतिक प्रजनन बेहद जरूरी होता है।
भारत में जन्मे शावक इस बात का संकेत देते हैं कि कुछ चीताएं यहां के वातावरण में प्रजनन करने में सक्षम हो रही हैं। हालांकि शावकों को वयस्क होने तक सुरक्षित रखना भी एक बड़ी चुनौती है।
जंगल में शिकारियों से लेकर बीमारी और मौसम तक कई तरह के खतरे होते हैं। इसलिए केवल जन्म लेने वाले शावकों की संख्या नहीं, बल्कि उनके लंबे समय तक जीवित रहने की दर भी परियोजना की सफलता के लिए महत्वपूर्ण होगी।
संख्या बढ़ी, लेकिन चुनौतियां भी बरकरार
चीता आबादी के 52 तक पहुंचने के बीच परियोजना को कई मुश्किल दौर से भी गुजरना पड़ा है। कुछ चीतों की मौत ने उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य प्रबंधन और नए वातावरण में अनुकूलन को लेकर सवाल भी खड़े किए।
वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए यह स्वाभाविक चुनौती है कि किसी दूसरे महाद्वीप से लाई गई प्रजाति को नए वातावरण में स्थापित करने के दौरान कई तरह के जोखिम सामने आ सकते हैं।
इसीलिए चीतों की नियमित स्वास्थ्य जांच, उनके व्यवहार का अध्ययन और भोजन तथा शिकार की उपलब्धता की निगरानी लगातार जारी रखना जरूरी है।
केवल चीता नहीं, पूरा पारिस्थितिकी तंत्र महत्वपूर्ण
चीता संरक्षण को केवल एक जानवर की संख्या बढ़ाने की परियोजना के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसके साथ उन प्राकृतिक क्षेत्रों को बचाने की जरूरत भी जुड़ी है जहां चीते रह सकते हैं।
चीतों के लिए खुले जंगल और घासभूमियां महत्वपूर्ण हैं। इन इलाकों में हिरण, नीलगाय और दूसरे शाकाहारी जीव भी पाए जाते हैं, जो खाद्य श्रृंखला का हिस्सा हैं।
यदि घासभूमियों का संरक्षण बेहतर होता है तो उसका लाभ कई अन्य प्रजातियों को भी मिल सकता है। इस लिहाज से चीता परियोजना भारत के व्यापक वन्यजीव संरक्षण प्रयासों से जुड़ जाती है।
आगे दूसरे क्षेत्रों पर भी नजर
कूनो में चीतों की संख्या बढ़ने के साथ भविष्य में दूसरे उपयुक्त क्षेत्रों को विकसित करने की जरूरत भी बढ़ सकती है। एक ही राष्ट्रीय उद्यान पर पूरी आबादी का निर्भर रहना लंबे समय के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
अलग-अलग सुरक्षित क्षेत्रों में चीता आबादी विकसित होने से बीमारी, प्राकृतिक आपदा या स्थानीय परिस्थितियों से होने वाले जोखिम को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही चीतों को पर्याप्त क्षेत्र मिलने पर उनकी प्राकृतिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा।
आनुवंशिक विविधता भी बड़ी चुनौती
चीता संरक्षण में एक और महत्वपूर्ण विषय जेनेटिक डाइवर्सिटी यानी आनुवंशिक विविधता है। छोटी आबादी में लंबे समय तक सीमित संख्या में जानवर रहने से आनुवंशिक विविधता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इसी वजह से अलग-अलग स्रोतों से चीतों को भारत लाने की योजना को महत्व दिया गया है। भविष्य में स्वस्थ आबादी तैयार करने के लिए जानवरों के चयन और उनके आनुवंशिक संबंधों पर भी ध्यान देना होगा।
सफलता का असली पैमाना क्या होगा?
भारत में 52 चीते होना निश्चित रूप से इस अभियान का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन संरक्षण विशेषज्ञों के लिए अंतिम लक्ष्य इससे कहीं आगे है।
स्थायी सफलता तब मानी जाएगी जब भारत में चीते लंबे समय तक स्वस्थ रहें, नियमित रूप से प्रजनन करें, उनके शावक वयस्क आबादी का हिस्सा बनें और अलग-अलग सुरक्षित क्षेत्रों में उनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़े।
साथ ही स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण होगी। जंगल के आसपास रहने वाले लोगों और वन्यजीवों के बीच संतुलन बनाए बिना किसी भी संरक्षण परियोजना को लंबे समय तक सफल बनाना मुश्किल हो सकता है।
इतिहास से भविष्य की ओर
भारत में चीते की वापसी केवल एक विलुप्त प्रजाति को फिर से लाने की कहानी नहीं है। यह देश के वन्यजीव संरक्षण के उस प्रयास का हिस्सा है जिसमें पुरानी जैव विविधता को फिर से मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
चार साल के भीतर 52 चीतों तक पहुंची आबादी ने इस अभियान को नई गति दी है। अब आने वाले वर्षों में ध्यान इस बात पर रहेगा कि यह संख्या कितनी स्थायी और आत्मनिर्भर आबादी में बदलती है।
भारत में एक समय जिस चीते को विलुप्त घोषित कर दिया गया था, उसकी रफ्तार अब एक बार फिर देश के जंगलों में दिखाई दे रही है। इस वापसी को स्थायी बनाने की जिम्मेदारी अब संरक्षण व्यवस्था, वैज्ञानिक निगरानी और प्राकृतिक आवास के बेहतर प्रबंधन पर होगी।















