बागी पार्षदों की रणनीति से बढ़ा असमंजस, मतदान के अधिकार से लेकर सड़क और प्रशासनिक फैसलों तक सदन में उठे सवाल
कानपुर। कानपुर नगर निगम सदन की बैठक शनिवार को कार्यकारिणी समिति के छह रिक्त पदों के चुनाव को लेकर खासा महत्वपूर्ण रही। चुनाव का एजेंडा पहले से तय था, लेकिन सदन की कार्यवाही शुरू होने के साथ ही नगर निगम की अंदरूनी राजनीति, बागी पार्षदों की भूमिका और शहर से जुड़े कई मुद्दे चर्चा के केंद्र में आ गए। महापौर की अध्यक्षता में हुई बैठक को लेकर पहले से ही राजनीतिक गतिविधियां तेज थीं और छह बागी पार्षदों की रणनीति ने पूरे घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना दिया।
नगर निगम कार्यकारिणी में कुल 12 सदस्य होते हैं। छह सदस्यों का कार्यकाल अगस्त में समाप्त होने के बाद इन पदों को भरने के लिए सदन की बैठक बुलाई गई थी। इन रिक्तियों में कार्यकाल पूरा करने वाले पार्षदों के अलावा सिविल लाइंस क्षेत्र के पार्षद यशपाल सिंह के निधन से खाली हुई सीट भी शामिल है।
छह सीटों के चुनाव पर टिकी निगाहें
कार्यकारिणी के रिक्त पदों पर चुनाव को लेकर पिछले कुछ दिनों से ही नगर निगम की राजनीति में बैठकों और आपसी सहमति बनाने की कोशिशों का दौर चल रहा था। महापौर की ओर से भी सर्वसम्मति से चुनाव कराने की तैयारी की बात कही गई थी।
लेकिन इसी बीच नगर निगम के छह पार्षदों की गतिविधियों ने चुनाव को लेकर अलग चर्चा खड़ी कर दी। पवन गुप्ता, लक्ष्मी कोरी, विकास जायसवाल, हरिस्वरूप निक्कू तिवारी, अंकित मौर्य और आलोक पांडेय को लेकर पहले से नगर निगम की राजनीति में मतभेदों की चर्चा रही है।
इन पार्षदों ने कार्यकारिणी चुनाव को लेकर अपनी रणनीति बनाई। रिपोर्टों के मुताबिक इनकी ओर से आलोक पांडेय को कार्यकारिणी में शामिल कराने की पैरोकारी भी की गई। छह वोटों की स्थिति चुनावी समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही थी।
दो पार्षदों के मतदान पर बना सवाल
इस पूरे घटनाक्रम का एक अहम पहलू पवन गुप्ता और अंकित मौर्य से जुड़ा रहा। दोनों पार्षदों को पूर्व की सदन बैठकों से निष्कासित किया जा चुका है। ऐसे में यह सवाल उठा कि कार्यकारिणी के चुनाव में दोनों को मतदान करने का अधिकार मिलेगा या नहीं।
रिपोर्टों के मुताबिक दोनों पार्षदों ने मतदान से रोके जाने की स्थिति में विरोध की रणनीति बनाई थी। वहीं बाकी बागी पार्षदों की भूमिका को लेकर भी चुनाव से पहले स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी। यही वजह रही कि कार्यकारिणी चुनाव से पहले नगर निगम की राजनीति में छह वोटों को लेकर चर्चाएं बनी रहीं।
इस विवाद की पृष्ठभूमि भी पुरानी है। पिछले महीनों में इन पार्षदों की ओर से सदन में विकास कार्यों, बजट आवंटन और पार्षदों के साथ कथित भेदभाव जैसे मुद्दे उठाए जाते रहे हैं। दूसरी ओर नगर निगम और महापौर पक्ष की ओर से इन आरोपों पर अलग-अलग जवाब दिए गए हैं। इसलिए मौजूदा चुनाव को केवल छह रिक्त पदों की सामान्य प्रक्रिया के तौर पर नहीं देखा जा रहा था।
सड़कों का मुद्दा भी सदन में उठा
कार्यकारिणी चुनाव के बीच शहर की बदहाल सड़कों का मुद्दा भी सदन में उठा। पार्षदों की ओर से शहर में सड़क और विकास कार्यों को लेकर सवाल किए गए।
यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नगर निगम की बैठकों में पार्षद लगातार अपने-अपने वार्ड की समस्याएं उठाते रहे हैं। सड़क, नाली, सीवर, सफाई और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कामों को लेकर पार्षदों और निगम अधिकारियों के बीच सवाल-जवाब की स्थिति बनती रही है।
ऐसे में कार्यकारिणी के छह सदस्यों के चुनाव के साथ-साथ सदन में विकास कार्यों को लेकर चर्चा ने बैठक का दायरा बढ़ा दिया।
मंगल भवन की कमेटी पर भी सवाल
बैठक के दौरान मंगल भवन से जुड़ी कमेटी को लेकर भी नगर आयुक्त से जवाब मांगे जाने की बात सामने आई। पार्षदों की ओर से प्रशासनिक फैसलों और समितियों के कामकाज को लेकर सवाल उठाए गए।
नगर निगम में अलग-अलग समितियां विकास और प्रशासन से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में किसी समिति को भंग करने या उसकी संरचना में बदलाव को लेकर पार्षदों की आपत्ति सामने आना भी सदन की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है।
यानी जिस बैठक का मुख्य एजेंडा कार्यकारिणी की छह सीटों का चुनाव था, उसमें शहर के विकास और निगम के प्रशासनिक फैसले भी बहस का हिस्सा बन गए।
ज्ञापन लेकर पहुंचे आलोक पांडेय
बैठक के दौरान पार्षद आलोक पांडेय भी अपने क्षेत्र की समस्याओं से जुड़ा ज्ञापन लेकर पहुंचे। उनकी ओर से क्षेत्र की समस्याओं को महापौर के सामने रखने की कोशिश की गई।
हालांकि इस दौरान विवाद की स्थिति बनने की बात सामने आई। आरोप लगाया गया कि ज्ञापन देने पहुंचे लोगों को थाने भेज दिया गया। इसके विरोध में आलोक पांडेय ने सदन की कार्यवाही का बहिष्कार किया और बाहर चले गए।
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर संबंधित पक्षों के दावों को अलग-अलग तरीके से देखा जाना जरूरी है। किसी भी आरोप की स्वतंत्र पुष्टि या अंतिम निष्कर्ष जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जा सकता है।
पहले भी विवादों में रहे हैं बागी पार्षद
नगर निगम के इन छह पार्षदों की नाराजगी कोई नई घटना नहीं है। पिछले महीनों में इनके द्वारा सदन में विकास कार्यों और निगम की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। जून 2026 में भी इन पार्षदों को लेकर बीजेपी के भीतर विवाद और सामूहिक इस्तीफे की चेतावनी तक की खबर सामने आई थी।
सितंबर में बजट आवंटन को लेकर भी बागी पार्षदों ने आरोप लगाए थे और 15वें वित्त तथा निगम निधि के इस्तेमाल पर सवाल उठाए थे। इन आरोपों पर नगर निगम प्रशासन और संबंधित जनप्रतिनिधियों का पक्ष अलग रहा है।
इस पृष्ठभूमि में कार्यकारिणी चुनाव ने नगर निगम की अंदरूनी राजनीति को एक बार फिर सामने ला दिया।
अब आगे क्या?
कार्यकारिणी समिति नगर निगम के महत्वपूर्ण निर्णयों में भूमिका निभाती है। ऐसे में छह नए सदस्यों के चयन के बाद समिति का समीकरण भी बदलना स्वाभाविक है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि नई कार्यकारिणी में किन पार्षदों को जगह मिलती है और चुनाव के दौरान बागी पार्षदों की भूमिका क्या रहती है। इसके अलावा सदन में सड़क, विकास कार्य, समितियों और पार्षदों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे आगे किस रूप में उठते हैं, इस पर भी नजर रहेगी।
फिलहाल कानपुर नगर निगम में छह कार्यकारिणी पदों का चुनाव सिर्फ एक नियमित चुनावी प्रक्रिया नहीं रह गया है। इसके साथ पार्षदों के बीच चल रही खींचतान, विकास कार्यों को लेकर सवाल और सदन की कार्यप्रणाली से जुड़े मुद्दे भी जुड़ गए हैं। आने वाले दिनों में कार्यकारिणी की नई संरचना और नगर निगम के भीतर इन मतभेदों का असर किस तरह दिखाई देता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।















