PM मोदी के 76वें जन्मदिन पर करोड़ों दीयों के आयोजन के बीच भूख, कुपोषण और गरीबी को लेकर बहस तेज हुई। सवाल है कि लोकतंत्र में उत्सव, जनसेवा और सार्वजनिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन कैसे तय हो।
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन पर देश के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर दीप प्रज्ज्वलन कार्यक्रम आयोजित किए गए। मध्य प्रदेश, गुजरात और दिल्ली समेत अलग-अलग स्थानों पर लाखों-करोड़ों दीये जलाने के कार्यक्रमों ने जहां उत्सव का माहौल बनाया, वहीं सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहस में इन आयोजनों की प्राथमिकता को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं।
‘आशीर्वाद का दीया’ नाम से आयोजित कार्यक्रमों के तहत मध्य प्रदेश में करीब 3.55 करोड़ दीये, उज्जैन में 33.27 लाख और गुजरात में 88 लाख से अधिक दीये जलाने की जानकारी सामने आई। दिल्ली के कर्तव्य पथ पर भी 1.25 लाख दीये जलाने की योजना बताई गई। अलग-अलग आयोजनों के आंकड़ों को जोड़कर करीब 11 करोड़ दीयों का अनुमान लगाया जा रहा है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि देशभर में जलाए गए दीयों की संख्या का कोई एकीकृत आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
11 करोड़ दीयों पर कितना खर्च?
सोशल मीडिया पर इन आयोजनों के खर्च को लेकर भी कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। यदि केवल अनुमान के लिए एक दीये में 10 से 15 मिलीलीटर तेल, दीये की कीमत एक रुपये और बत्ती की कीमत 10 पैसे मानी जाए, तो करीब 11 करोड़ दीयों के लिए लाखों लीटर तेल की जरूरत का अनुमान लगाया जा सकता है।
लेकिन इसे वास्तविक सरकारी खर्च मानना सही नहीं होगा। किसी आयोजन पर वास्तव में कितना पैसा खर्च हुआ, यह जानने के लिए खरीद बिल, आयोजक संस्थाओं के रिकॉर्ड, सरकारी बजट और भुगतान दस्तावेजों की जरूरत होगी। इसलिए सोशल मीडिया पर बताए जा रहे किसी भी अनुमान को आधिकारिक खर्च समझने से पहले तथ्य-जांच जरूरी है।
उत्सव के बीच भूख और कुपोषण का सवाल
बहस का दूसरा पहलू देश में भूख और पोषण की स्थिति से जुड़ा है। Global Hunger Index 2025 के अनुसार भारत में कुपोषण से जुड़ी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। रिपोर्ट में भारत की undernourishment दर 12 प्रतिशत और पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में wasting दर 18.7 प्रतिशत बताई गई है। रिपोर्ट ने भारत की स्थिति को ‘serious’ श्रेणी में रखा है।
हालांकि, गरीबी की तस्वीर का दूसरा पक्ष भी सामने रखना जरूरी है। नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार भारत में बहुआयामी गरीबी का अनुपात 2013-14 के 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 11.28 प्रतिशत हुआ। इसी अवधि में करोड़ों लोगों के बहुआयामी गरीबी से बाहर आने का अनुमान लगाया गया है।
इससे साफ है कि गरीबी और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में सुधार के दावे और उपलब्ध आंकड़े मौजूद हैं, लेकिन पोषण और भूख की चुनौती को पूरी तरह समाप्त मानना अभी जल्दबाजी होगी।
असली बहस दीयों की संख्या नहीं, प्राथमिकता की है
प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर होने वाले ऐसे कार्यक्रमों को लेकर मूल सवाल केवल यह नहीं है कि कितने दीये जलाए गए या उन पर कितना खर्च हुआ।
बड़ा सवाल यह है कि लोकतंत्र में किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री के सार्वजनिक आयोजनों का स्वरूप कैसा होना चाहिए और ऐसे आयोजनों को जनसेवा की गतिविधियों से किस तरह जोड़ा जाए।
क्या बड़े पैमाने पर होने वाले जन्मदिन कार्यक्रमों के साथ रक्तदान शिविर, जरूरतमंद परिवारों के लिए भोजन, स्वास्थ्य जांच, रोजगार सहायता, कौशल प्रशिक्षण या पोषण अभियान जैसी गतिविधियों को और व्यापक बनाया जा सकता है?
दूसरी ओर, समर्थकों की ओर से यह तर्क दिया जा सकता है कि ऐसे आयोजन सामाजिक भागीदारी, सांस्कृतिक उत्सव और जनसंपर्क का माध्यम होते हैं। कई स्थानों पर दीप प्रज्ज्वलन के साथ रक्तदान और सेवा से जुड़े कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।
‘प्रधान सेवक’ या सत्ता की भव्यता?
यहीं से बहस प्रधानमंत्री की सार्वजनिक छवि तक पहुंचती है। नरेंद्र मोदी लंबे समय से स्वयं को ‘प्रधान सेवक’ के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि प्रधानमंत्री के जन्मदिन से जुड़े सार्वजनिक आयोजनों में सादगी, सेवा और जनभागीदारी का संतुलन किस तरह दिखाई देना चाहिए।
क्या बड़े पैमाने पर व्यक्तिगत शुभकामना कार्यक्रम लोकतांत्रिक सार्वजनिक जीवन का सामान्य हिस्सा हैं या इन्हें जनसेवा की गतिविधियों के साथ अधिक मजबूती से जोड़ा जाना चाहिए—यह एक राजनीतिक और सामाजिक बहस है, जिसका अंतिम मूल्यांकन जनता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के स्तर पर होना है।
इस पूरे मामले में एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है—दीयों की संख्या, उनके अनुमानित खर्च और देश में भूख की स्थिति को आपस में जोड़ते समय तथ्य और अनुमान के बीच अंतर बनाए रखना होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन उन सवालों के जवाब भी तथ्यों, दस्तावेजों और आंकड़ों के आधार पर तलाशे जाने चाहिए।
प्रधानमंत्री का जन्मदिन उत्सव का अवसर हो सकता है, लेकिन उसी अवसर पर देश की गरीबी, पोषण, रोजगार और जनकल्याण की प्राथमिकताओं पर चर्चा होना भी लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
















One Response
सबसे ज्यादा आबादी वाले देश में रहने जाने वाले हम लोग भारतीय निवासी जिसमें हमारे देश के प्रधानमंत्री अपने जन्म उत्सव में दीप जलाते हैं जो लगभग 11 करोड़ दीपक और 11 लाख हजार करोड़ लीटर तेल जिसकी कुल कीमत लगभग 50 से 100 करोड़ रुपए खर्चा हुए होंगे जो यह पैसा देश के किसानों के हित में उपयोग नहीं होगा लेकिन देशान के किसानों का कर्जा पूरा वसूला जाएगा..
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजूए कातिल में है।
इंकलाब जिंदाबाद