नीट पेपर लीक के खिलाफ जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की अगुवाई में हुए प्रदर्शन के बाद राजनीति में एक Gen-Z शब्द काफी चर्चा में है. कहा जा रहा है कि देश की राजनीति में युवा वोटर सबसे बड़ा गेमचेंजर बन सकता है, जिसका लिटमस टेस्ट 2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब समेत सात राज्यों में होने वाले विधानभा चुनाव में हो जाएगा. यही वजह है कि बीजेपी हो या विपक्ष, दोनों की नजर अब सिर्फ पारंपरिक वोट बैंक पर नहीं, बल्कि मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया में पली-बढ़ी इस पीढ़ी पर भी है.
Gen Z के लिए सिर्फ जाति, धर्म या पुराने राजनीतिक मुद्दे ही काफी नहीं हैं. नौकरी, पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाएं, महंगाई, डिजिटल दुनिया, AI, स्टार्टअप और भविष्य के अवसर जैसे मुद्दे उनके लिए ज्यादा मायने रखते हैं. यही कारण है कि राजनीतिक दलों ने युवाओं तक पहुंचने का तरीका भी बदलना शुरू कर दिया है.
पीएम मोदी का फ्रंट कैमरा कनेक्शन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से सोशल मीडिया पर युवाओं से सीधे जुड़ने की कोशिश करते रहे हैं. लेकिन हाल के महीनों में उनका अंदाज और ज्यादा युवा-केंद्रित दिखाई दिया है. जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन से लेकर सोशल मीडिया पर युवाओं के बीच चल रही बहस तक, सरकार और विपक्ष दोनों यह समझ रहे हैं कि नई पीढ़ी की नाराजगी या समर्थन चुनावी नतीजों पर असर डाल सकता है.
पीएम मोदी ने युवाओं से जुड़ने के लिए सेल्फी वीडियो और Instagram रील जैसे सोशल मीडिया फॉर्मेट का भी इस्तेमाल किया. इसका मकसद साफ है युवाओं से उसी भाषा और प्लेटफॉर्म पर बात करना, जहां वे सबसे ज्यादा समय बिताते हैं.
चुनावी राज्यों के आंकड़ों में समझिए GEN-Z वोट की ताकत
- देश में 18 से 29 साल की उम्र के लोगों की हिस्सेदारी करीब 22.78% बताई गई है.
- उत्तर प्रदेश में 18-29 साल के लोगों की हिस्सेदारी करीब 21.19% है.
- गुजरात में यह आंकड़ा करीब 23.32% है.
- पंजाब में युवा आबादी की हिस्सेदारी करीब 21.44% है.
- उत्तराखंड में यह करीब 22.18% है.
- हिमाचल प्रदेश में करीब 21.91% युवा 18-29 साल की उम्र के हैं.
- मणिपुर में यह आंकड़ा करीब 23.74% है.
- गोवा में 18-29 साल के लोगों की हिस्सेदारी करीब 19.60% बताई गई है.
यानी जिन सात राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां युवा वोटर का हिस्सा इतना बड़ा है कि कोई भी पार्टी इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती.
सिर्फ वोट नहीं, मुद्दों पर भी मुखर हैं Gen Z
नई पीढ़ी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह अपनी बात कहने के लिए पारंपरिक राजनीतिक मंच का इंतजार नहीं करती. एक पोस्ट वायरल हुई, कोई मीम ट्रेंड करने लगा या किसी मुद्दे पर हजारों लोग हैशटैग चलाने लगे, तो वह मुद्दा कुछ ही घंटों में राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाता है.
NEET और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवादों में भी छात्रों और युवाओं की ऑनलाइन सक्रियता इसका उदाहरण रही है. सोशल मीडिया ने युवाओं को अपनी बात सीधे सरकार और राजनीतिक दलों तक पहुंचाने का मौका दिया है. इसलिए आज किसी सरकार के लिए युवाओं की नाराजगी सिर्फ कैंपस तक सीमित मामला नहीं है. वह कुछ ही समय में सोशल मीडिया के जरिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती है.
राहुल गांधी भी बना रहे हैं युवाओं से सीधा कनेक्शन
कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी युवाओं और छात्रों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. उनका ‘छात्रों की गूंज’ अभियान इसी रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है. राहुल गांधी लगातार युवाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकार को घेरते रहे हैं. रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, शिक्षा और सिस्टम में पारदर्शिता जैसे मुद्दों को लेकर वह युवाओं के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इंदौर में 19 सितंबर को होने वाले ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के लिए 75 हजार से ज्यादा रजिस्ट्रेशन होने का दावा किया गया है. अगर यह संख्या सही रहती है तो यह भी संकेत है कि युवा वर्ग के बीच इन मुद्दों को लेकर काफी दिलचस्पी है.
RSS भी समझ रहा है GEN-Z की अहमियत
युवाओं की बढ़ती राजनीतिक भूमिका सिर्फ राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी नई पीढ़ी के साथ संवाद बढ़ाने पर जोर देता रहा है. संघ प्रमुख मोहन भागवत की युवाओं के साथ बातचीत और अलग-अलग मंचों पर नई पीढ़ी से संवाद इसी दिशा में देखा जा सकता है. दरअसल, युवा वोटर को अपने साथ जोड़ने की चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं है. यह लंबे समय तक राजनीतिक समर्थन का आधार तैयार करने की भी कोशिश है.
‘दिमागी नक्सल’ से लेकर सोशल मीडिया वार तक
युवाओं को लेकर राजनीतिक बहस सिर्फ विकास और रोजगार तक सीमित नहीं है. बीजेपी और विपक्ष के बीच वैचारिक टकराव भी सोशल मीडिया पर तेजी से पहुंच रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त के लाल किले के भाषण में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया. बाद में उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के कार्यक्रम में भी इस मुद्दे को उठाया. विपक्ष ने इस बयान को लेकर सरकार पर सवाल खड़े किए. राहुल गांधी ने भी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सरकार पर निशाना साधा.
यानी आने वाले समय में युवाओं तक पहुंचने की लड़ाई सिर्फ योजनाओं और रोजगार के वादों की नहीं होगी. विचारधारा और सोशल मीडिया नैरेटिव की लड़ाई भी उतनी ही अहम होगी.
गुजरात में पीएम मोदी का बड़ा युवा संदेश
गुजरात में पीएम मोदी का वडोदरा दौरा भी इसी नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. यहां उन्होंने 35 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की विकास परियोजनाओं की सौगात दी. पीएम मोदी ने AI, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर और दूसरे आधुनिक सेक्टरों की जरूरतों का जिक्र करते हुए कहा कि आने वाले समय में भारत को इन क्षेत्रों में दुनिया के सामने बड़ी ताकत बनना होगा. इन क्षेत्रों की चर्चा सीधे तौर पर युवाओं के भविष्य और रोजगार के नए अवसरों से जुड़ती है. सरकार का संदेश है कि भारत को नई तकनीक के दौर में आगे ले जाने का फायदा सबसे ज्यादा युवा पीढ़ी को मिलेगा. इसके साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए ऑनलाइन मुफ्त कोचिंग जैसी योजनाओं का भी जिक्र किया गया.
2027 में किस तरफ जाएगा युवा वोट? यही सबसे बड़ा सवाल
युवा वोटर किसी एक पार्टी के साथ पूरी तरह बंधा हुआ नहीं माना जा सकता. वह मुद्दे के हिसाब से अपनी पसंद बदल सकता है. सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे को लेकर समर्थन और चुनाव में वोट देने का फैसला भी हमेशा एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं है. लेकिन एक बात साफ है 2027 के विधानसभा चुनावों में युवा मतदाताओं को नजरअंदाज करना किसी भी पार्टी के लिए आसान नहीं होगा.
बीजेपी युवाओं को विकास, तकनीक और भविष्य के अवसरों के जरिए जोड़ने की कोशिश कर रही है. विपक्ष रोजगार, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था और सिस्टम की जवाबदेही जैसे मुद्दों के जरिए युवाओं तक पहुंचना चाहता है. आखिरकार चुनाव में फैसला सिर्फ भाषणों या सोशल मीडिया ट्रेंड से नहीं होगा. युवा वोटर के सामने असली सवाल यही रहेगा कि किस पार्टी के पास उसके पढ़ाई, नौकरी और बेहतर भविष्य का भरोसेमंद जवाब है. 2027 में उत्तर प्रदेश समेत सात राज्यों के चुनाव इस बात की बड़ी परीक्षा होंगे कि Gen Z सिर्फ सोशल मीडिया पर अपनी राय जताती है या मतदान के दिन भी अपनी पसंद को उसी ताकत के साथ जाहिर करती है.















